Author: डॉ0 वेद प्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
डॉ.. वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है, जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया।
डॉ. वेदप्रताप वैदिक का जन्म 30 दिसंबर 1944 को पौष की पूर्णिमा पर इंदौर में हुआ। वे रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत के भी जानकार हैं। उन्होंने अपनी पीएच.डी. के शोधकार्य के दौरान न्यूयार्क की कोलंबिया युनिवर्सिटी, मास्को के ‘इंस्तीतूते नरोदोव आजी’, लंदन के ‘स्कूल आॅफ ओरिंयटल एंड एफ्रीकन स्टडीज़’ और अफगानिस्तान के काबुल विश्वविद्यालय में अध्ययन और शोध किया।

कहाँ गई वे बोलियाँ ?
पिछले 50 साल में लगभग सवा दो सौ भारतीय बोलियाँ समाप्त हो गई हैं। 1961 में भारत में 1100 भाषाएँ ...
अफगानिस्तान कभी आर्याना था
आज अफगानिस्तान और इस्लाम एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं, इसमें शक नहीं लेकिन यह भी सत्य है कि वह ...
जाति से पिंड कैसे छूटे?
जन्मना जाति-व्यवस्था भारत का अभिशाप है। उसे भंग करने का नारा महर्षि दयानंद और डॉ राममनोहर लोहिया जैसे समाज सुधारकों ...
सजा ऐसी कि रूह कांप जाए
निर्भया के बलात्करियों को अदालत ने दोषी तो पाया है लेकिन वह उन्हें फांसी देगी या नहीं, यह उहापोंह बनी ...
उइगर आतंकवाद से त्रस्त चीन
अपने यहां कहावत है कि ‘जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई’! चीन अब तक भारत की ...
तिब्बत पर ज़रा जुबान हिलाएं
तिब्बत की कराह ने सारी दुनिया को कॅंपा दिया है| दुनिया को पता है कि जो चीनी सरकार अपनी हान ...
कोतवाल पर कौन डाले हाथ ?
सांसद बाबू भाई कटारा गिरफ्तार नहीं होते तो शायद कबूतरबाजी का पिटारा बंद ही पड़ा रहता| कटारा के पिटारे से ...
नंदीग्राम क्यों बन गया बंदीग्राम
नवभारत टाइम्स, 26 मार्च 2007 : मार्क्सवादी सरकार अपवाद नहीं हैं| काँग्रेसी, भाजपाई, सपाई आदि कोई भी सरकार वही करती, ...
चीन से हम क्या सीखें
पिछले दो हजार साल में भारत ने चीनियों को इतनी विद्याएँं, इतना धर्म, इतना दर्शन और इतना आचार-विचार सिखाया है ...